पुकार

पुकार

जब प्यार करने वालों में किन्हीं बातों को लेकर मतभेद होता हैं और वे दोनों एक – दूसरे से अलग – अलग हो जाते हैं , तब वो चाहकर भी अपने आप को उन्हें याद करने से नहीं रोक पाते हैं | मैंने इस कविता का शीर्षक ‘पुकार’ इसलिए दिया क्योकि एक – दूजे से नफरत करने के वावजूद वो एक – दूसरे को याद करने से नहीं रोक पाते  हैं |

 

पुकार

नजरें तलाशती हैं उन्हें .

जिन्हें दिल भूलना चाहता हैं  || 1 ||

यादे आती हैं उनकी ,

जिनकी हस्ती को मिटाना चाहता हूँ  || 2 ||

कदम बढ़ जाते हैं उनके आशियाने की ओर ,

जिनके परछाइयों से दूर जाना चाहता हूँ || 3 ||

लबों की मुस्कान खोजती हैं उनकों ,

जिनसे ये शिकवा करना चाहती हैं || 4 ||

मेरी हर धड़कन पुकारती हैं उन्हें ,

जिनके दीदार से रोम – रोम में आग लग जाती हैं || 5 ||

सपन कुमार सिंह , 19 / 04 / 2007 , गुरूवार 

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