चुनार – एक ऐतिहासिक नगर Part 1
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चुनार – एक ऐतिहासिक नगर Part 1

स्थिति –

चुनार भारत के उत्तर – प्रदेश राज्य के जिला – मिर्जापुर में पवित्र गंगा नदी के किनारे पर बसा एक तहसील स्तरीय क्षेत्र हैं | जहाँ नगर पालिका परिषद्  , चुनार भी हैं | यह मिर्जापुर जिला मुख्यालय से लगभग 36 किमी० की दूरी पर  , विन्ध्याचल से लगभग 42 किमी० की दुरी पर  , वाराणसी  ( बनारस ) कैन्ट से लगभग 50 किमी० की दूरी पर तथा मुगलसराय जंक्शन ( वर्तमान में पं० दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन ) से लगभग 40 किमी० की दूरी पर स्थित हैं | चुनार क्षेत्र की समुद्र तल ऊँचाई 84 मी० या 276 फीट हैं | यहाँ का पिन कोड – 231304 हैं |

चुनार - एक ऐतिहासिक नगर
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चुनार , रेलवे एवं सड़क मार्ग द्वारा मुख्य नगरों मिर्जापुर , विन्ध्याचल , वाराणसी , मुगलसराय से जुड़ा हुआ हैं | चुनार जंक्शन रेलवे स्टेशन दिल्ली – हावड़ा मुख्य रेलवे मार्ग पर स्थित हैं जबकि भारत की सबसे लम्बी राष्ट्रीय राजमार्ग ( NH 7 ) , वाराणसी से कन्याकुमारी , चुनार से होकर गुजरती हैं | भारत की पहली राष्ट्रीय जल राजमार्ग ( NWH  1 ) भी चुनार से होकर गुजरती हैं | चुनार में एक ओर मैदानी क्षेत्र हैं , तो दूसरी ओर विन्ध्य पर्वत श्रृंखला की पहाड़ियों से सजी मनोरम झांकी |

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इतिहास –

कहा जाता हैं कि जब असुरराज राजा बलि ( भगवान विष्णु के परम भक्त प्रहलाद के पौत्र )  ने जब तीनो लोक पर अपना आधिपत्य कर लिया , तब स्वर्ग लोक के राजा इन्द्र ने भगवान श्री हरि विष्णु से देवलोक को पुन: प्राप्त करने की प्रार्थना की | प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वामन ( एक छोटे कद का ब्राहमण व्यक्ति ) का रूप लिया तथा राजा बलि के पास अपने रहने हेतु तीन कदम के बराबर भूमि की माँगी | राजा बलि एक दयालु तथा वचन का पक्का असुरराज था | अपने गुरु शुक्राचार्य के मना करने के बावजूद भी उसने वामन अवतारी श्री विष्णु को तीन कदम भूमि प्रदान की | तब वामन ने अपना रूप बड़ा किया और एक कदम में पूरा भू – लोक , दूसरे कदम में स्वर्ग लोक को नाप लिया | उन्होंने राजा बलि से पूछा की तीसरा कदम कहाँ रखु इस पर वचन के पक्के राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया | भगवत कथा के अनुसार वामन अवतारी भगवान ने भूमि पर अपना कदम जहाँ रखा , वह स्थान चुनार था  |  चुनार के किले का आकार पैर के आकार का हैं एवं इसका एक नाम चरणाद्रि धाम भी हैं |

चुनार - एक ऐतिहासिक नगर
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चुनार के किले का निर्माण उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा अपने भाई राजा भर्तहरि के लिए बनवाया गया | उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के बाद इस किले पर 1141  ई० से 1191 ई० तक पृथ्वीराज चौहान, 1198  ई० में शहाबुद्दीन गौरी, 1333 ई० से स्वामीराज, 1445 ई० से  जौनपुर  के मुहम्मदशाह शर्की, 1512  ई० से सिकन्दर शाह लोदी, 1529  ई० से बाबर, 1530  ई० से शेरशाहसूरी और 1537 ई० से हुमायूं आदि शासकों का अधिपत्य रहा है। शेरशाह सूरी से हुए युद्ध में हुमायूं ने इसी किले में शरण ली थी।

चुनार का एक नाम नैनागढ़ भी हैं | आल्हा खण्ड के अनुसार 1029 AD में राजा सहादेव ने इस किले को अपनी राजधानी बनाई तथा यहाँ के विन्ध्य पर्वत श्रृंखला की एक गुफा में नैना योगिनी की प्रतिमा ( मूर्ति ) स्थापित की एवं इस क्षेत्र का नाम नैनागढ़ रखा | राजा सहादेव ने यहाँ पर 52 राजाओं पर विजय के प्रश्चात 52 स्तम्भों वाले पत्थर की छतरी का निर्माण कराया , जो कालान्तर में सम्राट शेरशाह सूरी का दरबार बना | चुनार किले में राजा सहादेव ने अपनी बहादुर पुत्री सोनवा के विवाह हेतु हीरे – मोतियों एवं माणिक्य जड़ित अलंकृत मंडप का निर्माण कराया गया , जिसे सोनवा मंडप कहा जाता हैं | यह सोनवा मंडप आज भी यहाँ पर उपस्थित हैं और चुनार किले की शोभा बढ़ा रही हैं |

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1537 ई० में मुग़लशासक हुमांयू चुनार आया तथा तीन माह प्रवास के पश्चात चुनार एवं जौनपुर के बदले में शेरशाह सूरी से बंगाल पर अधिकार  प्राप्त किया | 1574 ई० में मुगलशासक अकबर ने पुन: चुनार को अपने आधिपत्य में ले लिया और इस प्रकार यहाँ पर 1772 ई० तक मुगलों का शासन रहा | मुग़लशासक जहाँगीर ने इफ्तेखार खां को यहाँ का नजीम नियुक्त किया | इफ्तेखार खां की मृत्यु के पश्चात उसका भव्य मकबरा चुनार किले से पूरब दिशा में दो किमी० की दूरी पर सरईयाँ नामक स्थान पर बनवाया गया |  वर्तमान में यहाँ पर इसे पुरानी तहसील के नाम से जाना  जाता हैं |

1772 ई०  में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इस किले पर अधिकार कर लिया और शस्त्र एवं गोला बारूद का भण्डारगृह बनवाया | लगभग 1781 ई० में बनारस के राजा चेत सिंह ने इस पर अधिकार कर लिया |

चुनार के किले पर कुल 14 राजाओं ने शासन किया , जिसका विवरण किले पूर्वी दरवाजे के समीप दीवार पर सफ़ेद संगमरमर पर उत्कीर्ण हैं |

देवकीनंदन कृत प्रसिद्ध उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’ चुनार के किले पर ही आधारित हैं | यहाँ अक्सर बालीवुड एवं भोजपुरी फिल्मों की सूटिंग होती रहती हैं |

ठहरने हेतु स्थान –

  1.  चुनार रलवे स्टेशन से  2 किमी० की दूरी पर स्थित आचार्य जी मंदिर में श्री विठ्ठलनाथ गेस्ट हॉउस  हैं , जो सारी सुविधाओं से युक्त हैं एवं रूम  किराया भी बहुत ही कम हैं |
  2.  चुनार रेलवे स्टेशन से  1 किमी० की दूरी पर श्री हीरा लाल वर्मा लाँज स्थित हैं |
  3.  चुनार बाजार स्थित अग्रवाल कलेक्शन के बगल में स्थित हैं |
चुनार - एक ऐतिहासिक नगर
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व्यवसाय एवं उद्दोग –

चुनार नगर के समीप स्थित ग्रामीण क्षेत्रों का मुख्य व्यवसाय कृषि हैं , जो कि बारिश के पानी के साथ – साथ नहरों द्वारा होने वाले सिचाईं पर निर्भर हैं | जबकि चुनार नगर के निवासियों का मुख्य व्यवसाय यहाँ का पाटरी उद्दोग हैं | यहाँ चीनी – मिटटी एवं प्लास्टर आँफ पेरिस ( POP ) की मूर्तियाँ और सामान बनाए जाते हैं , जिनकी बिक्री हेतु दशहरा एवं दीपावली पर मूर्ति बाजार स्थापित किये जाते हैं |

चुनार - एक ऐतिहासिक नगर
http://www.chunar.net/2017/07/history-of-chunar-famous-poetry-art.html

 

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पर्यटन स्थल –

चुनार नगर एवं चुनार के समीप कई रमणीय स्थल हैं , जिनमें से कुछ आपको इतिहास के बागीचे में जाने से नहीं रोक पायेगें तो वहीँ कुछ  आपको प्रकृति  बिलकुल समीप ले जायेंगे |

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चुनार किला 

चुनार किला पर्यटन हेतु सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता हैं | इस किले की निगरानी एवं रख – रखाव पुरातत्व विभाग के हाथों में हैं | इस किले में उत्तर – प्रदेश पुलिस का पहला पी० ए० सी० ट्रेनिंग सेंटर भी संचालित हैं | यहाँ पर्यटन हेतु राजा भरथरि की जीवित समाधि हैं , जहाँ  पर सुबह व्  शाम को पूजा – पाठ होती रहती हैं | इसके अलावा सोनवा मंडप , कारागार , शेरशाह सूरी का दरबार हैं | दरबार क्षेत्र से गंगा नदी एवं नगर का विहंगम दृश्य पर्यटकों को आनन्दित एवं आकर्षित करता हैं | यहाँ सूर्य घड़ी , डाक बंगला एवं शस्त्रागार सहित कई स्थल मौजूद हैं , पर वह प्रवेश – निषेध क्षेत्र हैं |

चुनार - एक ऐतिहासिक नगर
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कब्रगाह एवं गिरजाघर –

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में राज्यों के सीमा पर स्थित होने के कारण  काफी समय तक इसका सैनिक महत्व बना रहा। यह वारेन हेस्टिंग्ज का यह अत्यंत प्रिय निवास स्थान था। कंपनी ने चुनार का उपयोग अपन सेनाओं के वृद्ध तथा रोगी सैनिकों को बसाने के लिये किया था। यूरोपीय लोगों का निवास स्थान होने के चिह्न अभी तक कब्रगाह और गिरजाघर के रूप में वर्तमान में विद्दमान हैं। यहाँ पर यूरोपीय लोगों के दो कब्रगाह हैं |

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  1.  चुनार किले के दक्षिणी – पश्चिमी दरवाजे ( मुख्य दरवाजे ) की ओर गंगा नदी के किनारे स्थित कब्रगाह , जहाँ के पक्की कब्रों पर कंपनी के सैनिकों एवं अधिकारियों के नाम , पद एवं समय उत्कीर्ण हैं |
  2. चुनार किले के पूर्व में लगभग 2 किमी० की दूरी पर संत थामस कान्वेन्ट स्कूल के बगल में स्थित हैं | यह कब्रगाह चारों  ओर चाहारदीवारी से घिरा हुआ हैं | इस कब्रगाह का रख – रखाव प्राप्त सूचना के आधार पर विद्दालय समिति के पास हैं | यह कब्रगाह पहले वाले कब्रगाह से अधिक बड़ा हैं एवं यहाँ ज्यादा कब्रे हैं |

दरगाह शरीफ –

चुनार रेलवे स्टेशन से लगभग 1.5 किमी० की दूरी पर महान अस्ताना हजरत बाबा मुहम्मद कासिम अफ्गानी सुलैमानी का मकबरा हैं , जिसे  दरगाह शरीफ भी कहते हैं | यह करीब 400 वर्षों से अधिक पुराना हैं | इस दरगाह शरीफ पर सुदूर क्षेत्र के लोग जियारत करने एवं मन्नत मागने और पूरी करने आते हैं |

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यहाँ बाबा साहब के मजार के अलावा उनके रिश्तेदारों एवं उनके अनुयायियों की भी मजारें हैं | यहाँ मुगलशासक जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ का भी मकबरा हैं | मकबरे क्षेत्र के प्रवेश द्वार पर नक्काशी दरवाजा स्थित हैं , जिसकी भव्यता देखते ही बनती हैं | प्रतिवर्ष चैत्र माह में यहाँ उर्ष का मेला लगता हैं , जिसमे काफी ज्यादा भीड़ उमड़ती हैं |

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नवल बाबा वीर –

दरगाह शरीफ के समीप में ही एक ऊँची पहाड़ी हैं , जहाँ नवल बाबा वीर का मंदिर हैं | यहाँ के मुख्य  पुजारी श्री दिवाकर लाल हैं | इस पहाड़ी की विशेषता यह हैं कि इस पहाड़ी से देखने पर लगभग पूरे चुनार का नजारा दिखाई देता हैं | एक ओर रेलवे लाइन पर तेजी से दौड़ती ट्रेने नजर आती हैं , तो वाही दूसरी ओर दरगाह शरीफ , गंगा नदी , चुनार किला एवं बस्ती का भव्य नजारा दिखाई देता हैं | वहीँ तीसरी ओर विन्ध्य पर्वत श्रृंखला की क्रमबद्ध पहाड़ियाँ नजर आती हैं | यहाँ प्राचीन समय के भवनों के अवशेष भी उपस्थित हैं | यहाँ आकर बैठने पर मानों जैसे दिल का सुकून व चैन वापस मिल गया हों |

 

चुनार के अन्य पर्यटन स्थलों के बारे में जानने के ली जरुर पढ़े  : चुनार – एक ऐतिहासिक नगर part 2 , जिसका लिंक नीचे दिया हुआ हैं |

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