इक मूर्ति सजा लेना

इक मूर्ति सजा लेना

कभी तनहा होकर ,

हमें भी याद कर लेना ,

अपने मुस्कुराते होठों पर ,

हमारी भी एक कली खिला लेना || 1 ||

कभी आइनें में देखकर ,

हमें भी निहार लेना ,

अपनी सुन्दरता के रंग में ,

हमारी भी एक चमक मिला लेना || 2 ||

कभी पनघट के किनारे ,

हमें भी बुला लेना ,

अमृत से भरी सुराही में ,

हमारी भी एक बूँद मिला लेना || 3 ||

कभी सरगोशियों के आलम में ,

हमें भी आजमाँँ लेना ,

अपने दिल के धड़कनों में ,

हमारी भी एक धड़कन शामिल कर लेना || 4 ||

कभी मुरादों के कतार में ,

हमें भी खुदा से माँग लेना ,

अपने हँसी जहाँ के बंदिशों में ,

हमारी भी एक मूर्ति सजा लेना || 5 ||

सपन कुमार सिंह , 21/02/2008 , गुरूवार

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