मैं भारत , अखण्ड भारत

मैं भारत , अखण्ड भारत

मैं भारत , अखण्ड भारत नामक इस कृति को मैने  14 अगस्त 2009 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लिखा । यह कविता मेरी अच्छी कविताओं में से एक हैं । वैसे इस कविता को मैने कई अवसर पर कुछ लोगों के मध्य सुना चुका हूं , पर इसका जिक्र मैने कभी किसी भी नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक , ट्वीटर आदि पर कभी नही किया । पर अब मैं यह कविता अपनी वेबसाइट के माध्यम से प्रस्तुत करता हूं । इस कविता का शीर्षक है –  मैं भारत , अखण्ड भारत

 

मैं भारत , अखण्ड भारत 

मैं  भारत ,  अखण्ड भारत ,

ना  काट  सका ,

ना  मार सका ,

ऐसी  वो तलवार कहाँ  ।। 1 ।।

विश्व के कोनों तक फैली ,

जिसकी संस्कृति अगाथ ,

ना मिट सका , ना मिटेगा ,

ऐसी वो तूफान कहाँ ।। 2 ।।

हर कोने से घिरा मैं ,हर नजर तीखीं तनी ,

पर ना बांध सका , ना गिरा सका ,

ऐसी वो बाँध कहाँ ,

मैं विशाल , मैं अखण्ड भारत ।। 3 ।।

अमीरी ना झुका सकी ,

गरीबी ना तोड़ सकी ,

जो   मुझे   गिराये ,

ऐसी वो ठोकर कहाँ ।। 4 ।।

ना  डिगा  सका ,ना  बुझा  सका  ,

ऐसी वो बरसात कहाँ ,

विश्व शांति का दूत बना मैं ,

ऐसी कोई विश्वगुरु कहाँ ।। 5 ।।

हैं   अंह   भरी   बातें   मेरी ,

पर  अंह  लेश   मात्र   नहीं ,

विश्व  कल्याण  पर  अर्पण ,

मेरा    हर    शब्द    यहाँ ,

मैं भारत ,अखण्ड भारत ।। 6 ।।

(  सपन कुमार सिंह )  14 / 08 / 2009 , शुक्रवार !

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